मीडिया कारोबार से जुड़ा साधना मीडिया ग्रुप इन दिनों कुछ गंभीर आरोपों को लेकर चर्चा में है। समूह के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर राकेश कुमार गुप्ता पर आरोप लगाए गए हैं कि चैनल की फ्रेंचाइजी, मालिकाना हक और प्रसारण कारोबार में हिस्सेदारी दिलाने का वादा करके अलग-अलग लोगों से बड़ी रकम ली गई। शिकायत करने वालों का कहना है कि पैसे देने के बावजूद उन्हें वह अधिकार या सुविधा नहीं मिली, जिसका भरोसा दिलाया गया था।
मीडिया को मिले इनपुट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के कुछ लोगों ने इस तरह के लेनदेन को लेकर शिकायतें की हैं। दावा किया जा रहा है कि कुछ लोगों की डेढ़ करोड़ रुपये से लेकर तीन करोड़ रुपये तक की रकम फंसी हुई है। हालांकि, इन आरोपों और बताई गई रकम की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है।
चैनल दिलाने के वादे और भुगतान को लेकर सवाल
मीडिया क्षेत्र में अपना चैनल शुरू करना या किसी स्थापित चैनल का मालिकाना हक हासिल करना कई लोगों के लिए बड़ा व्यावसायिक अवसर होता है। आरोप है कि इसी उम्मीद में कुछ लोगों ने चैनल की फ्रेंचाइजी या स्वामित्व पाने के लिए बड़ी रकम दी थी।
शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, पैसे देने के बाद उन्हें प्रसारण से जुड़े नियमों, सरकारी दिशानिर्देशों और जरूरी औपचारिकताओं का हवाला देकर इंतजार करने को कहा जाता रहा। कुछ लोगों का दावा है कि लंबे समय तक आश्वासन मिलने के बावजूद उनका काम पूरा नहीं हुआ और रकम भी वापस नहीं मिली।
अब इस मामले में कई सवाल उठ रहे हैं। क्या संबंधित पक्षों के बीच लिखित समझौते हुए थे? रकम किन शर्तों पर ली गई थी? क्या चैनल का स्वामित्व या फ्रेंचाइजी देने के लिए जरूरी मंजूरियां उपलब्ध थीं? इन सवालों के जवाब संबंधित दस्तावेजों और दोनों पक्षों की बात सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
यदि शिकायतों में किए गए दावे सही पाए जाते हैं, तो मामले की विस्तृत जांच की जरूरत हो सकती है।
अमित शाह के साथ तस्वीर को लेकर भी चर्चा
इन आरोपों के बीच राकेश कुमार गुप्ता की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ तस्वीर को लेकर भी चर्चा होने की बात कही गई है। इनपुट में दावा किया गया है कि यह तस्वीर उनके व्हाट्सएप डिस्प्ले पिक्चर पर लगी हुई है।
हालांकि, किसी राजनीतिक या सार्वजनिक व्यक्ति के साथ तस्वीर होना अपने आप में कारोबारी संबंध, सरकारी संरक्षण या किसी तरह के प्रभाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। तस्वीर किस संदर्भ में ली गई थी और क्या इसका किसी शिकायत से कोई संबंध है, इस बारे में फिलहाल कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है।
अगर किसी शिकायतकर्ता का आरोप है कि तस्वीर या कथित राजनीतिक संपर्क का इस्तेमाल भरोसा दिलाने अथवा दबाव बनाने के लिए किया गया, तो उसकी पुष्टि के लिए संबंधित बातचीत, दस्तावेज या अन्य साक्ष्यों की जरूरत होगी।
सरकारी विज्ञापनों को लेकर भी उठे सवाल
साधना मीडिया ग्रुप के चैनलों को सरकारी विज्ञापन मिलने के संबंध में भी सवाल उठाए गए हैं। उपलब्ध इनपुट में समूह के पास 16 चैनल होने की बात कही गई है, जबकि भोपाल के एक संपादक के हवाले से यह संख्या करीब 22 बताई गई है। ऐसे में समूह के चैनलों की वास्तविक संख्या को लेकर भी स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है।
आरोप लगाने वाले कुछ लोगों का कहना है कि समूह के कुछ चैनलों को सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं, जबकि उनकी पात्रता और संबंधित सरकारी दिशानिर्देशों के पालन को लेकर सवाल हैं। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए संबंधित चैनलों की सूची, विज्ञापन आवंटन का रिकॉर्ड और लागू नियमों की जांच आवश्यक है।
यह भी देखना होगा कि संबंधित चैनलों को विज्ञापन किस आधार पर दिए गए, उन्होंने पात्रता की किन शर्तों को पूरा किया और क्या इस संबंध में किसी सरकारी विभाग के पास कोई शिकायत दर्ज है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर सरकारी विज्ञापन आवंटन में किसी अनियमितता को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
अब किन बातों पर स्पष्टता जरूरी?
पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जिन लोगों ने रकम देने का दावा किया है, उनके पास भुगतान और समझौते से जुड़े क्या दस्तावेज हैं। साथ ही, चैनल की फ्रेंचाइजी या मालिकाना हक देने के लिए किन शर्तों पर सहमति बनी थी और उन शर्तों को पूरा करने में क्या बाधाएं आईं, यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
राकेश कुमार गुप्ता और साधना मीडिया ग्रुप का इस मामले में आधिकारिक पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी में उनकी ओर से इन आरोपों पर कोई पुष्ट प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। इसलिए उनका पक्ष जाने बिना आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
निष्कर्ष: साधना मीडिया ग्रुप से जुड़े इन आरोपों की सच्चाई जानने के लिए शिकायतकर्ताओं के दावों, भुगतान के दस्तावेजों, कथित समझौतों और संबंधित पक्षों के जवाब की जांच जरूरी है। जब तक इन तथ्यों की पुष्टि नहीं होती, तब तक मामले को आरोपों और शिकायतों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।